अहोई अष्टमी 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और कथा
सनातन धर्म में अहोई अष्टमी का व्रत बहुत खास माना जाता है। माताएं यह व्रत अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सफलता के लिए रखती हैं। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह निर्जला व्रत बच्चों की सुरक्षा का सबसे बड़ा ढाल बनता है।
आचार्य शरद जी ने कहा है कि अगर सही मुहूर्त और विधि-विधान से अहोई माता की पूजा की जाए, तो संतान पर आने वाली सभी परेशानियां अपने आप टल जाती हैं।
अहोई अष्टमी 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त
अहोई अष्टमी का व्रत करवा चौथ के चार दिन बाद और दिवाली से आठ दिन पहले आता है।
| पूजन अंग | समय / विवरण |
| अहोई अष्टमी तिथि | 1 नवंबर 2026 (रविवार) |
| पूजा का शुभ मुहूर्त | शाम 05:36 से शाम 06:54 तक |
| तारों को देखने का समय | शाम 06:00 बजे के बाद |
| चंद्रोदय (चांद निकलने) का समय | रात्रि 11:40 बजे |
अहोई अष्टमी का धार्मिक महत्व
अहोई अष्टमी का मतलब होता है “अनहोनी को होनी में बदलना”। Bhavishya Nakshatra के अनुसार, यदि किसी बच्चे की कुंडली में कोई ग्रह दोष है या लगातार बीमारियां आ रही हैं, तो मां का यह व्रत चमत्कार की तरह काम करता है। आचार्य शरद जी ने कहा है कि इस दिन माता अहोई के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से बच्चों को दीर्घायु मिलती है।
आसान पूजा विधि
अहोई अष्टमी की पूजा शाम को तारों के निकलने पर की जाती है।
व्रत संकल्प: सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और अहोई माता का ध्यान करते हुए निर्जला व्रत का संकल्प लें।
पूजा स्थान की तैयारी: घर की उत्तर या पूर्व दीवार पर अहोई माता और उनके आठ बच्चों (स्याऊ) का चित्र बनाएं या बाजार से लाया फोटो लगाएं।
कलश स्थापना: चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और जल से भरा कलश रखें।
भोग और प्रसाद: अहोई माता को रोली, अक्षत, दूध-चावल की खीर, हलवा और 8 पूरियों का भोग लगाएं।
स्याऊ की माला: चांदी के मनकों और लॉकेट वाली माला धारण की जाती है, जिसमें हर साल दो चांदी के दाने बढ़ाए जाते हैं।
कथा और अर्घ्य: हाथ में गेहूं के दाने लेकर अहोई अष्टमी की कथा सुनें। इसके बाद शाम को तारों को जल से अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।
अहोई अष्टमी की पौराणिक व्रत कथा
एक साहूकार के सात बेटे और सात बहुएं थीं। उसकी एक बेटी भी थी, जो दिवाली पर मायके आई थी। दिवाली की तैयारी के लिए बहुएं और बेटी जंगल में मिट्टी लेने गईं। मिट्टी खोदते समय बेटी की खुरपी गलती से एक स्याऊ (शाही) के बच्चे को लग गई, जिससे बच्चे की मौत हो गई। दुखी होकर स्याऊ माता ने साहूकार की बेटी की कोख बांधने का शाप दे दिया।
बेटी के रोने पर सबसे छोटी बहू ने वह दोष अपने ऊपर ले लिया। इसके बाद छोटी बहू जब भी बच्चा जन्म देती, वह 7 दिन में मर जाता। दुखी होकर छोटी बहू ने पंडितों से उपाय पूछा। आचार्य शरद जी ने कहा है कि जब व्यक्ति सच्चे मन से अपनी गलती मानकर पछतावा करता है, तो माता अहोई दया जरूर दिखाती हैं।
छोटी बहू ने स्याऊ माता की बहुत सेवा की, जिससे प्रसन्न होकर स्याऊ माता ने उसे पुत्रवती होने का वरदान दिया। छोटी बहू ने कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन निर्जला व्रत रखकर अहोई माता की पूजा की। व्रत के प्रभाव से उसके सभी बच्चे जीवित हो गए। तभी से अहोई अष्टमी का व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई।
संतान सुख और तरक्की के उपाय
Bhavishya Nakshatra के अनुसार, यदि इस दिन कुछ विशेष उपाय किए जाएं तो लाभ होता है:
संतान प्राप्ति के लिए: दूध में पीपल के पत्ते डालकर अहोई माता को चढ़ाएं और शिव-पार्वती का अभिषेक करें।
संतान की तरक्की के लिए: अहोई माता को 8 मालपुए का भोग लगाएं और गरीबों में बांट दें।
सुरक्षा के लिए: आचार्य शरद जी ने कहा है कि चांदी की माला में अहोई माता का लॉकेट पहनाकर बच्चे को पहनाएं, इससे नजर दोष खत्म होता है।
लेखक एवं ज्योतिषाचार्य:
Acharya Sharad Swarup
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