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गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन क्यों निषेध है, इसके पीछे की पौराणिक कथा और ज्योतिषीय कारण।

गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ की जाती है। लेकिन इस दिन चंद्र दर्शन (Moon sighting) को वर्जित माना गया है।पौराणिक कथाओं और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माना जाता है कि गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा देखने से मिथ्या दोष लगता है, जिससे व्यक्ति पर झूठा आरोप लग सकता है। पौराणिक कथा: चंद्र दर्शन वर्जित क्यों? पौराणिक कथा के अनुसार एक बार गणेश जी अपने वाहन मूषक पर सवार होकर लौट रहे थे। तभी चंद्रमा ने उनका उपहास किया। क्रोधित होकर गणेश जी ने चंद्रमा को शाप दिया कि जो भी गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन करेगा, उस पर झूठा आरोप लगेगा।बाद में देवताओं और ऋषियों के अनुरोध पर गणेश जी ने शाप को शिथिल किया और कहा कि जो भक्त इस दिन सिंहासन कथा या गणेश चतुर्थी व्रत कथा का पाठ करेगा, वह इस दोष से मुक्त हो जाएगा। Contact Acharya Sharad Swaroop Ji यदि आप जानना चाहते हैं कि Ganesh Chaturthi 2025: Why You Should Not Sight the Moon आपकी व्यक्तिगत कुंडली और जीवन पर क्या असर डाल सकता है, तो तुरंत संपर्क करें। कॉल करें: +91-9818359075आचार्य शरद स्वरूप जी आपकी जन्म कुंडली देखकर बताएंगे कि मिथ्या दोष या चंद्रमा से संबंधित ग्रहदोष को कैसे दूर किया जा सकता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से चंद्र दर्शन चंद्रमा मन और भावनाओं का कारक है। इस दिन चंद्र दर्शन करने से मानसिक अस्थिरता और झूठे आरोप लगने का खतरा बढ़ता है। यदि आपकी कुंडली में चंद्रमा से संबंधित दोष (जैसे चंद्र–राहु या चंद्र–केतु का मेल) है तो यह और अधिक प्रभाव डाल सकता है। इसलिए इस दिन विशेष सावधानी बरतनी चाहिए और कथा सुनकर ही व्रत का समापन करना चाहिए। और अधिक जानकारी के लिए गणेश चतुर्थी कथा और महत्व  हमारी ज्योतिषीय सेवाएँ देखें  निष्कर्ष Ganesh Chaturthi 2025: Why You Should Not Sight the Moon का रहस्य यह है कि यह केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं बल्कि ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन चंद्र दर्शन से बचना चाहिए ताकि जीवन में अनावश्यक आरोप और बाधाएँ न आएं। सही मार्गदर्शन और अपनी कुंडली का सटीक विश्लेषण पाने के लिए अभी आचार्य शरद स्वरूप जी (+91-9818359075) से संपर्क करें।

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अंक ज्योतिष और पूर्णिमा: गुरु पूर्णिमा पर आपका जन्मांक क्या कहता है?

गुरु पूर्णिमा का दिन ज्ञान, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर होता है। यह पूर्णिमा विशेष रूप से गुरु, आचार्य और मार्गदर्शकों को समर्पित है।अंक ज्योतिष (Numerology) के अनुसार, इस दिन चंद्रमा की ऊर्जा जन्मांक के आधार पर अलग-अलग प्रभाव डालती है। इसलिए हर व्यक्ति के लिए गुरु पूर्णिमा के अवसर पर विशेष संदेश छुपा होता है। जन्मांक के अनुसार गुरु पूर्णिमा का प्रभाव जन्मांक 1 – आत्मविश्वास बढ़ेगा, नए कार्य शुरू करने का अवसर मिलेगा।जन्मांक 2 – भावनाओं पर नियंत्रण रखें, गुरु का आशीर्वाद सफलता दिलाएगा।जन्मांक 3 – ज्ञान प्राप्ति और शिक्षा से जुड़े कार्यों में प्रगति होगी।जन्मांक 4 – अनुशासन और परिश्रम से नए अवसर प्राप्त होंगे।जन्मांक 5 – यात्रा और नए संबंध लाभकारी रहेंगे।जन्मांक 6 – परिवार और प्रेम जीवन में सुखद परिणाम मिलेंगे।जन्मांक 7 – आध्यात्मिक उन्नति और ध्यान से शांति मिलेगी।जन्मांक 8 – करियर और वित्तीय मामलों में सकारात्मक बदलाव होंगे।जन्मांक 9 – सेवा कार्य और परोपकार से शुभ फल प्राप्त होंगे। Contact Acharya Sharad Swaroop Ji यदि आप जानना चाहते हैं कि Numerology of Full Moons: What Your Birth Number Says on Guru Purnima आपके जीवन और कुंडली को कैसे प्रभावित करेगा, तो तुरंत संपर्क करें। कॉल करें: +91-9818359075आचार्य शरद स्वरूप जी आपकी जन्म कुंडली और अंक ज्योतिष का विश्लेषण करके बताएंगे कि गुरु पूर्णिमा आपके लिए कौन से अवसर और चुनौतियाँ लेकर आई है। गुरु पूर्णिमा और आध्यात्मिक महत्व गुरु पूर्णिमा पर गुरु, शिक्षक और आचार्यों की पूजा करने से जीवन में ज्ञान और सफलता की वृद्धि होती है। इस दिन ध्यान, साधना और जप से मानसिक शांति प्राप्त होती है। अंक ज्योतिष के अनुसार यह दिन जन्मांक और चंद्रमा की स्थिति के आधार पर जीवन में विशेष परिणाम देता है। और अधिक जानकारी के लिए अंक ज्योतिष और पूर्णिमा का महत्व  हमारी ज्योतिषीय सेवाएँ देखें  निष्कर्ष Numerology of Full Moons: What Your Birth Number Says on Guru Purnima हमें यह समझाता है कि हर पूर्णिमा, विशेषकर गुरु पूर्णिमा, जन्मांक के अनुसार जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का अवसर देती है।इस दिन गुरु और आचार्य की कृपा के साथ-साथ अंक ज्योतिष का गहरा प्रभाव भी महसूस किया जा सकता है। अपनी कुंडली और जन्मांक का सटीक विश्लेषण जानने के लिए अभी आचार्य शरद स्वरूप जी (+91-9818359075) से संपर्क करें।

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पिठोरी अमावस्या और राहु का गोचर: एक अनोखा अमावस्या महोत्सव

पिठौरी अमावस्या, भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है। यह विशेष रूप से माताओं द्वारा अपने बच्चों की दीर्घायु और समृद्धि के लिए की जाने वाली पूजा है। इसे एक अनोखा अमावस्या पर्व कहा जाता है क्योंकि इस दिन पिठौरियाँ (आटे की मूर्तियाँ) बनाकर उनकी पूजा की जाती है। 2025 में यह अमावस्या और भी खास है क्योंकि इसके समय राहु का गोचर महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा। राहु का संबंध मायाजाल, भ्रम और अचानक घटने वाली घटनाओं से है। ऐसे में पिठौरी अमावस्या पर की गई पूजा और व्रत का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। पिठौरी अमावस्या की पौराणिक मान्यता माना जाता है कि इस दिन माता पिथौरी देवी की पूजा करने से बच्चों की रक्षा होती है। महिलाएँ आटे की 64 पिठौरियाँ बनाकर देवी की पूजा करती हैं। यह व्रत परिवार में सुख, शांति और समृद्धि लाता है। Contact Acharya Sharad Swaroop Ji यदि आप जानना चाहते हैं कि Pithori Amavasya & Rahu’s Transit: A Unique New Moon Festival आपके जीवन और कुंडली को कैसे प्रभावित करेगा, तो तुरंत संपर्क करें। कॉल करें: +91-9818359075आचार्य शरद स्वरूप जी आपको बताएंगे कि राहु गोचर और अमावस्या का आपकी राशि पर क्या प्रभाव पड़ेगा और कौन से उपाय करने चाहिए। राहु गोचर और अमावस्या का ज्योतिषीय महत्व राहु भ्रम और अवरोध का कारक है। अमावस्या पर राहु का प्रभाव व्यक्ति के मानसिक संतुलन और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। जिनकी कुंडली में राहु–चंद्र दोष या कालसर्प दोष है, उनके लिए यह समय विशेष पूजा और मंत्रजप करने का होता है। पिठौरी अमावस्या पर राहु शांत करने के लिए गणेश और देवी पूजन अत्यंत शुभ माना गया है। और अधिक जानकारी के लिए अमावस्या और राहु का महत्व  हमारी ज्योतिषीय सेवाएँ देखें  निष्कर्ष Pithori Amavasya & Rahu’s Transit: A Unique New Moon Festival केवल मातृ शक्ति की पूजा का पर्व ही नहीं बल्कि ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन सही समय पर पूजा और राहु से संबंधित उपाय करने से जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं और परिवार में सुख–शांति आती है। अपनी कुंडली और राहु गोचर से संबंधित विस्तृत जानकारी पाने के लिए अभी आचार्य शरद स्वरूप जी (+91-9818359075) से संपर्क करें।

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गुरु पूर्णिमा: ज्ञान का पर्व और ज्योतिष में बृहस्पति का महत्व

गुरु पूर्णिमा को भारत में ज्ञान, आस्था और गुरु–शिष्य परंपरा का पर्व माना जाता है। यह दिन आध्यात्मिक ऊर्जा और बृहस्पति ग्रह (Jupiter) के प्रभाव से विशेष महत्व रखता है।ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को गुरु, ज्ञान, धर्म और सत्य का कारक माना गया है। इसीलिए गुरु पूर्णिमा को ज्ञान का पर्व कहा जाता है। गुरु पूर्णिमा और ज्योतिषीय दृष्टि से बृहस्पति का महत्व ज्ञान और शिक्षा का ग्रह – बृहस्पति व्यक्ति की शिक्षा, बुद्धि और अध्यात्म का प्रतिनिधित्व करता है। धर्म और नीति का कारक – यह ग्रह धर्म, न्याय और सत्य के पालन को प्रोत्साहित करता है। सकारात्मक ऊर्जा का संचार – गुरु पूर्णिमा पर गुरु और बृहस्पति की कृपा से जीवन में शुभ ऊर्जा आती है। जीवन में मार्गदर्शन – जिनकी कुंडली में बृहस्पति शुभ स्थिति में हो, वे जीवन में सम्मान, ज्ञान और सफलता प्राप्त करते हैं। Contact Acharya Sharad Swaroop Ji यदि आप जानना चाहते हैं कि Why Guru Purnima Is the Day of Wisdom: Role of Jupiter in Astrology आपके जीवन और कुंडली को कैसे प्रभावित करेगा, तो तुरंत संपर्क करें। कॉल करें: +91-9818359075आचार्य शरद स्वरूप जी आपकी जन्म कुंडली देखकर बताएंगे कि बृहस्पति ग्रह की स्थिति आपके जीवन में कौन से अवसर और चुनौतियाँ लेकर आई है। गुरु पूर्णिमा पर क्या करें? गुरु, आचार्य या शिक्षक का आशीर्वाद लें। विष्णु और बृहस्पति मंत्र का जप करें। जरूरतमंदों को भोजन और ज्ञान सामग्री दान करें। पीले वस्त्र और पीली वस्तुओं का दान विशेष फलदायी माना जाता है। और अधिक जानकारी के लिए गुरु पूर्णिमा का ज्योतिषीय महत्व  हमारी ज्योतिषीय सेवाएँ देखें  निष्कर्ष Why Guru Purnima Is the Day of Wisdom: Role of Jupiter in Astrology यह दर्शाता है कि गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से ज्ञान का स्रोत है।इस दिन गुरु और बृहस्पति ग्रह की कृपा से जीवन में सफलता, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। अपनी कुंडली का विश्लेषण और बृहस्पति ग्रह का विस्तृत प्रभाव जानने के लिए अभी आचार्य शरद स्वरूप जी (+91-9818359075) से संपर्क करें।

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Sun–Ketu Conjunction in Leo (17 अगस्त): एक विशेष ज्योतिषीय घटना

17 अगस्त को Sun–Ketu Conjunction in Leo (सूर्य–केतु युति सिंह राशि में) घटित होने जा रही है। यह एक महत्वपूर्ण ग्रह स्थिति है जो व्यक्ति के आत्मविश्वास, अहंकार और निर्णय लेने की क्षमता पर सीधा असर डाल सकती है। सूर्य आत्मा और अधिकार का प्रतीक है, जबकि केतु आध्यात्मिकता और मोक्ष का कारक माना जाता है। जब दोनों सिंह राशि (Leo) में आते हैं, तो व्यक्ति में आत्मसंघर्ष, भ्रम और असुरक्षा की स्थिति बन सकती है। Sun–Ketu Conjunction in Leo और जीवन पर प्रभाव करियर में अचानक परिवर्तन स्वास्थ्य संबंधी उतार–चढ़ाव पारिवारिक मतभेद और विवाद मानसिक तनाव और निर्णयों में असमंजस इस समय संयम और धैर्य रखना अत्यंत आवश्यक है। Contact Acharya Sharad Swaroop Ji यदि आप अपनी कुंडली का सटीक विश्लेषण चाहते हैं, तो आचार्य शरद स्वरूप जी से संपर्क करें।कॉल करें: +91-9818359075 वे आपको बताएंगे कि यह ग्रहयोग आपकी व्यक्तिगत कुंडली को किस प्रकार प्रभावित करेगा और समाधान क्या हो सकते हैं। त्योहारों के समय देखभाल के उपाय चूंकि अगस्त से लेकर आगे कई त्योहारों का समय है – जन्माष्टमी, रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी – ऐसे में ग्रह स्थिति के कारण आपको विशेष सावधानी रखनी होगी। 1. स्वास्थ्य की देखभाल त्योहारों में तैलीय और मीठे व्यंजनों का अधिक सेवन न करें। योग और ध्यान को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। 2. पारिवारिक रिश्ते अनावश्यक बहस से बचें। आपसी सहयोग और प्रेम से रिश्तों को मजबूती दें। 3. आर्थिक निर्णय नए निवेश या बड़े खर्च करने से पहले विशेषज्ञ से सलाह लें। 4. धार्मिक उपाय आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें। मंगलवार और रविवार को सूर्य देव को जल चढ़ाएं। केतु दोष निवारण हेतु गणेश पूजा करें। और अधिक जानकारी के लिए ज्योतिष में सूर्य–केतु युति का महत्व हमारी ज्योतिष सेवाएँ देखें ✨ निष्कर्ष Sun–Ketu Conjunction in Leo (17 अगस्त) एक विशेष खगोलीय घटना है जो जीवन में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव ला सकती है। ऐसे समय में संयम, साधना और उचित ज्योतिषीय परामर्श से आप अपने जीवन को संतुलित रख सकते हैं। सही मार्गदर्शन के लिए अभी आचार्य शरद स्वरूप जी (+91-9818359075) से संपर्क करें।

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जन्माष्टमी पर लोग भगवान कृष्ण की झूला क्यों झुलाते हैं?

जन्माष्टमी, भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का दिन, पूरे भारत में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन कृष्ण जन्म के प्रतीक स्वरूप उनका झूला सजाया जाता है और भक्त प्रेमपूर्वक झूला झुलाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस परंपरा के पीछे क्या आध्यात्मिक और ज्योतिषीय कारण हैं? जन्माष्टमी 2025 का शुभ मुहूर्त और पूजन विधि जानें झूला झुलाने का आध्यात्मिक महत्व भक्तगण मानते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण को झूला झुलाना उनके जन्म का आनंद मनाने और प्रेम अर्पित करने का तरीका है। यह क्रिया सौभाग्य, समृद्धि और शांति लाने वाली मानी जाती है। झूला झुलाना मंगलकारी कार्य है, जिससे घर में सुख-समृद्धि आती है। यह कार्य मां यशोदा के स्नेह का प्रतीक है, जिसमें भक्त अपने भावों को व्यक्त करते हैं। ज्योतिष के अनुसार, इस क्रिया से ग्रह दोष कम होते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। अपनी कुंडली के अनुसार जन्माष्टमी पर विशेष पूजन विधि और उपाय जानने के लिए संपर्क करें – आचार्य शरद स्वरूप जी (मो.) +91-9818359075 कुंडली विश्लेषण के लिए पंडित जी से संपर्क करें जन्माष्टमी पर लोग भगवान कृष्ण की झूला क्यों झुलाते हैं? – ज्योतिषीय दृष्टि से कारण ग्रहों की अनुकूलता: इस दिन झूला झुलाने से चंद्रमा और बुध के अशुभ प्रभाव कम होते हैं। शुभ संकल्प: भक्त जब झूला झुलाते हैं तो अपने जीवन में शुभ संकल्प लेते हैं। भक्ति और ध्यान: यह क्रिया मन को भक्ति भाव में डुबो देती है और मानसिक शांति देती है। निष्कर्ष भगवान श्रीकृष्ण का झूला झुलाना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम और ज्योतिषीय आशीर्वाद पाने का एक सुंदर माध्यम है। यदि आप जानना चाहते हैं कि जन्माष्टमी पर आपके लिए कौन से पूजन और उपाय सबसे शुभ होंगे, तो हमारी वेबसाइट पर जन्माष्टमी विशेष लेख पढ़ें और विशेषज्ञ परामर्श लें।

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जन्माष्टमी का उत्सव आधी रात को क्यों मनाया जाता है? वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, रोहिणी नक्षत्र में, आधी रात के समय हुआ था। यही कारण है कि जन्माष्टमी का पर्व पूरे देश में आधी रात को बड़े भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। लेकिन इसके पीछे केवल धार्मिक मान्यता ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तर्क भी मौजूद हैं। जन्माष्टमी 2025 का शुभ मुहूर्त और पूजन विधि जानें आधी रात को जन्माष्टमी मनाने के वैज्ञानिक कारण प्राकृतिक ऊर्जा का चरम स्तर – रात का समय, विशेषकर मध्यरात्रि, वातावरण में शांति और सकारात्मक ऊर्जा का समय माना जाता है। ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति – रोहिणी नक्षत्र में चंद्रमा का प्रभाव शांत और सौम्य ऊर्जा प्रदान करता है। पर्यावरणीय परिस्थितियाँ – रात के समय तापमान कम और वातावरण शांत होने से ध्यान और पूजा में एकाग्रता बढ़ती है। अपनी कुंडली के अनुसार जन्माष्टमी पर शुभ मुहूर्त और पूजन विधि जानने के लिए संपर्क करें – आचार्य शरद स्वरूप जी (मो.) +91-9818359075कुंडली विश्लेषण के लिए पंडित जी से संपर्क करें जन्माष्टमी का उत्सव आधी रात को क्यों मनाया जाता है? आध्यात्मिक दृष्टिकोण भगवान का अवतार समय – श्रीकृष्ण का जन्म कंस के कारागार में मध्यरात्रि को हुआ था, इसलिए भक्त इस समय को विशेष महत्व देते हैं। अंधकार से प्रकाश की ओर – आधी रात का समय अंधकार का प्रतीक है और भगवान का जन्म जीवन में प्रकाश, धर्म और सत्य लाने का संदेश देता है। भक्ति का चरम क्षण – इस समय मंत्रजप, भजन और आरती से वातावरण अत्यंत पवित्र हो जाता है। निष्कर्ष जन्माष्टमी का मध्यरात्रि उत्सव केवल परंपरा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक ऊर्जा और आध्यात्मिक संदेश का अद्भुत संगम है। यदि आप जानना चाहते हैं कि इस जन्माष्टमी आपके लिए कौन से उपाय और मुहूर्त विशेष लाभदायक होंगे, तो हमारी वेबसाइट पर जन्माष्टमी विशेष लेख पढ़ें और ज्योतिषीय परामर्श प्राप्त करें।

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जन्माष्टमी पर उपवास रखने के पीछे क्या है तर्क?

जन्माष्टमी, भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में पूरे भारत में अत्यंत श्रद्धा और उत्साह से मनाई जाती है। इस दिन भक्त उपवास रखकर, भजन-कीर्तन कर, और मध्यरात्रि को जन्मोत्सव मनाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जन्माष्टमी पर उपवास रखने के पीछे क्या है तर्क? इसका उत्तर धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक—तीनों दृष्टिकोण से मिलता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण: आत्मा की शुद्धि और भक्ति में एकाग्रता हिंदू धर्म में उपवास का उद्देश्य केवल भोजन त्यागना नहीं, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण और मन को ईश्वर की भक्ति में केंद्रित करना है। जन्माष्टमी पर उपवास रखने से मन और आत्मा दोनों शुद्ध होते हैं, जिससे भक्त श्रीकृष्ण के जन्म की पावन ऊर्जा को अनुभव कर पाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण: शरीर को डिटॉक्स करने का तरीका वैज्ञानिक रूप से, उपवास पाचन तंत्र को आराम देता है और शरीर को विषाक्त पदार्थों से मुक्त करता है। जन्माष्टमी पर उपवास रखने के पीछे का तर्क यह भी है कि सावन-भाद्रपद के बीच मौसम बदलने से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है, और उपवास शरीर को नए मौसम के अनुकूल बनाने में मदद करता है। जन्मपत्री विश्लेषण और व्यक्तिगत ज्योतिषीय मार्गदर्शन के लिए संपर्क करें – आचार्य शरद स्वरूप जी (+91-9818359075)यहाँ क्लिक करें और ज्योतिष परामर्श लें धार्मिक मान्यता: भगवान के प्रति प्रेम का प्रतीक धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान कृष्ण का जन्म आधी रात को कारागार में हुआ था। उपवास रखकर भक्त दिन भर उनकी लीला का स्मरण करते हैं और रात्रि के समय व्रत खोलकर जन्मोत्सव मनाते हैं। यह उपवास भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति का प्रतीक है। निष्कर्ष चाहे आध्यात्मिक हो, वैज्ञानिक हो, या धार्मिक कारण—जन्माष्टमी पर उपवास रखने के पीछे का तर्क भक्त के जीवन में अनुशासन, स्वास्थ्य और भक्ति की गहराई लाने का है।

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जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को मक्खन चढ़ाने का कारण क्या है?

जन्माष्टमी, भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव, पूरे भारत में बड़े उत्साह और भक्ति भाव से मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों और घरों में विशेष पूजा होती है, और भगवान को प्रिय भोग अर्पित किया जाता है। इनमें से सबसे प्रमुख है मक्खन। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को मक्खन चढ़ाने का कारण क्या है? आइए जानते हैं इसके धार्मिक और आध्यात्मिक रहस्य। धार्मिक कथा: नटखट गोपाल और मक्खन प्रेम श्रीमद्भागवत और पुराणों में वर्णित है कि बाल्यकाल में श्रीकृष्ण को मक्खन अत्यंत प्रिय था। वे ग्वाल-बालों के साथ मिलकर माखन-मटकी तोड़कर मक्खन चुराया करते थे। यह केवल उनकी बाललीला नहीं थी, बल्कि प्रेम और आनंद का प्रतीक भी था। इसी कारण भक्त जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को मक्खन चढ़ाने का कारण उनकी प्रिय वस्तु से उन्हें प्रसन्न करना मानते हैं। आध्यात्मिक अर्थ: मक्खन का प्रतीकात्मक महत्व आध्यात्मिक दृष्टि से मक्खन हृदय की शुद्धता और प्रेम का प्रतीक है। दूध से मक्खन निकालने की तरह, भक्त अपने मन की अशुद्धियों को निकालकर शुद्ध भक्ति अर्पित करते हैं। जब हम भगवान को मक्खन अर्पित करते हैं, तो यह हमारे शुद्ध और प्रेमपूर्ण भावों का दान होता है। जन्मपत्री विश्लेषण और व्यक्तिगत ज्योतिषीय मार्गदर्शन के लिए संपर्क करें – आचार्य शरद स्वरूप जी (+91-9818359075)यहाँ क्लिक करें और ज्योतिष परामर्श लें वैज्ञानिक दृष्टिकोण: स्वास्थ्य और पोषण का प्रतीक मक्खन ऊर्जा और पोषण का स्रोत है। भगवान को मक्खन अर्पित करना जीवन में स्वास्थ्य, स्फूर्ति और समृद्धि की कामना का भी प्रतीक है। त्योहारों में मक्खन और पंजीरी जैसे पौष्टिक भोग का महत्व भी इसी वजह से है। निष्कर्ष चाहे धार्मिक कथा हो, आध्यात्मिक प्रतीक हो, या स्वास्थ्य का संदेश—जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को मक्खन चढ़ाने का कारण भक्त और भगवान के बीच प्रेम का मधुर बंधन है।

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अक्षय तृतीया: नए आरंभ के लिए सबसे शुभ दिन – ज्योतिष के अनुसार

अक्षय तृतीया को हिंदू धर्म में सबसे पवित्र और शुभ तिथियों में से एक माना जाता है। यह दिन हर प्रकार के नए कार्यों की शुरुआत के लिए विशेष रूप से उपयुक्त होता है। विवाह, गृह प्रवेश, व्यवसाय शुरू करना, और सोना-चांदी खरीदना इस दिन शुभ फल देता है। अक्षय तृतीया का महत्व और पंचांग देखें अक्षय तृतीया: ज्योतिषीय दृष्टि से महत्व ज्योतिष के अनुसार, अक्षय तृतीया के दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों अपने उच्च राशि में होते हैं, जिससे यह दिन त्रेतायुग और द्वापरयुग की शुभ स्मृतियों से जुड़ा है। इस दिन किसी भी कार्य के लिए मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि यह स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। अपनी कुंडली के अनुसार अक्षय तृतीया पर शुभ कार्य कब और कैसे करें, जानने के लिए संपर्क करें – आचार्य शरद स्वरूप जी (मो.) +91-9818359075कुंडली विश्लेषण के लिए पंडित जी से संपर्क करें अक्षय तृतीया: नए आरंभ के लिए सबसे शुभ दिन – ज्योतिष के अनुसार व्रत व उपाय इस दिन किए गए शुभ कार्य दीर्घकालिक सफलता और समृद्धि देते हैं। कुछ विशेष उपाय — सोना या चांदी खरीदें – यह लक्ष्मी कृपा के लिए उत्तम है। अन्न, वस्त्र, जलदान और गरीबों को भोजन कराने से पुण्य मिलता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करें और पीले फूल, चावल, हल्दी अर्पित करें। हमारी वेबसाइट पर विशेष लेख पढ़ें अक्षय तृतीया: नए आरंभ के लिए सबसे शुभ दिन – ज्योतिष के अनुसार निष्कर्ष अक्षय तृतीया न केवल एक धार्मिक पर्व है बल्कि समृद्धि और सफलता का प्रतीक भी है। यदि आप इस दिन अपने जीवन में किसी बड़े कार्य की शुरुआत करना चाहते हैं, तो ज्योतिषीय मार्गदर्शन लेकर करें, ताकि परिणाम और भी शुभ हो।

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