माँ शैलपुत्री: नवरात्रि का पहला दिन, पूजा विधि और महत्व
नवरात्रि के पावन पर्व का शुभारंभ माँ दुर्गा के आचार्य शरद स्वरूप, माँ शैलपुत्री की उपासना से होता है। ये नवदुर्गा (नौ रूपों) में से पहली और सबसे प्रमुख शक्ति हैं।
पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। बैल पर सवार और हाथ में त्रिशूल धारण किए हुए, माँ का यह रूप दृढ़ता और पवित्रता का प्रतीक है। पहले दिन इनकी पूजा करने से ‘मूलाधार चक्र’ जागृत होता है और जीवन में स्थिरता आती है।
1. नवरात्रि 2026: शुभ मुहूर्त और तिथियाँ
1. नवरात्रि 2026: शुभ मुहूर्त और तिथियाँ
| नवरात्रि प्रकार | प्रारंभ तिथि | मुख्य आकर्षण |
| चैत्र नवरात्रि (वसंत) | 19 मार्च 2026 (गुरुवार) | घटस्थापना व हिंदू नववर्ष |
| शारदीय नवरात्रि (शरद) | 11 अक्टूबर 2026 (रविवार) | शक्ति पूजा व दुर्गा उत्सव |
विशेष मुहूर्त (11 अक्टूबर 2026):
प्रतिपदा तिथि प्रारंभ: 10 अक्टूबर 2026 को शाम 06:52 बजे।
प्रतिपदा तिथि समाप्त: 11 अक्टूबर 2026 को शाम 07:54 बजे।
शुभ रंग: इस दिन का विशेष रंग नारंगी (Orange) है, जो शक्ति और नई ऊर्जा का प्रतीक है।
2. माँ शैलपुत्री का दिव्य स्वरूप
माँ शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत दिव्य और मनमोहक है। उनकी छवि हमें जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने की प्रेरणा देती है:
सवारी: माँ शैलपुत्री वृषभ (बैल) पर सवार हैं, इसलिए इन्हें ‘वृषारूढ़ा’ भी कहा जाता है। यह बैल धर्म और अडिग विश्वास का प्रतीक है।
शस्त्र: माँ के दाहिने हाथ में त्रिशूल है, जो कष्टों के विनाश और रक्षा का प्रतीक है।
पुष्प: बाएं हाथ में कमल का फूल है, जो कीचड़ (संसार) में रहकर भी पवित्र बने रहने की सीख देता है।
मस्तक: उनके माथे पर सुशोभित अर्धचंद्र शांति और मानसिक संतुलन का परिचायक है।
3. ज्योतिषीय और आध्यात्मिक गहरा संबंध
माँ शैलपुत्री की पूजा केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि ज्योतिषीय और आध्यात्मिक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण है:
स्वामी ग्रह (चंद्रमा): ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, माँ शैलपुत्री चंद्रमा की अधिष्ठात्री देवी हैं। जिनकी कुंडली में चंद्रमा कमजोर होता है या जिन्हें मानसिक तनाव रहता है, उन्हें माँ शैलपुत्री की पूजा से विशेष शांति और एकाग्रता प्राप्त होती है।
मूलाधार चक्र: योग साधना में आज का दिन ‘मूलाधार चक्र’ पर ध्यान केंद्रित करने का है। यह शरीर का आधार चक्र है। इसकी सक्रियता से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और सुरक्षा की भावना आती है।
4. माँ शैलपुत्री की पौराणिक व्रत कथा
माँ शैलपुत्री की कथा त्याग, साहस और समर्पण की मिसाल है। अपने पूर्व जन्म में वे राजा दक्ष की पुत्री सती थीं। उन्होंने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से विवाह किया था।
एक बार राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सभी देवताओं को बुलाया गया लेकिन शिव जी को आमंत्रित नहीं किया गया। माता सती बिना बुलाए वहां पहुंचीं, जहां उनके पति का घोर अपमान किया गया। अपने आराध्य और पति का अपमान सहन न कर पाने के कारण सती ने उसी यज्ञ की योगाग्नि में आत्मदाह कर लिया।
अगले जन्म में उन्होंने हिमालय (शैल) के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और कठिन तपस्या कर पुनः शिव जी को प्राप्त किया। इसीलिए वे शैलपुत्री कहलाईं।
5. पूजा की चरण-दर-चरण विधि
नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना (कलश स्थापना) का विधान है। यहाँ इसकी संपूर्ण विधि दी गई है:
स्थान की शुद्धि: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पूजा घर को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें।
जौ बोना: एक मिट्टी के पात्र में शुद्ध मिट्टी डालें और उसमें जौ (ज्वारे) के बीज फैला दें।
कलश स्थापना: तांबे या मिट्टी के कलश में जल, गंगाजल, सुपारी, सिक्का और अक्षत डालें। कलश के मुख पर आम के 5 पत्ते रखें।
नारियल: एक नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर और मौली बांधकर कलश के ऊपर स्थापित करें।
आह्वान: माँ शैलपुत्री की तस्वीर के सामने घी का दीपक जलाएं और संकल्प लें।
भोग: माँ को गाय का शुद्ध घी या सफेद रंग की मिठाइयों का भोग लगाएं।
शक्तिशाली मंत्र:
बीज मंत्र:
|| ॐ शं शीं शुं शैलपुत्र्यै नमः ||प्रार्थना मंत्र:
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्वनीम्॥
6. माँ की पूजा के प्रमुख लाभ
माँ शैलपुत्री की भक्ति से भक्तों को निम्नलिखित वरदान प्राप्त होते हैं:
मानसिक शक्ति: मन शांत रहता है और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
पारिवारिक खुशहाली: घर के क्लेश दूर होते हैं और रिश्तों में मिठास आती है।
स्थिरता: करियर और व्यापार में आ रही अस्थिरता खत्म होती है।
ग्रह दोष निवारण: चंद्रमा से जुड़े सभी दोषों का अंत होता है।
7. क्या पहनें और क्या चढ़ाएं?
| विशेष श्रेणी | विवरण |
| पसंदीदा वस्त्र | नारंगी या पीला |
| पसंदीदा फूल | सफेद कनेर या गुड़हल |
| पसंदीदा भोग | गाय का घी, हलवा या रबड़ी |
| दान की वस्तु | सफेद अनाज या वस्त्र |
6. विशेष सेवा और संपर्क
निष्कर्ष: माँ शैलपुत्री हमें सिखाती हैं कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, हमें हिमालय की तरह अपने लक्ष्य पर अडिग रहना चाहिए। इस नवरात्रि, यदि आप पूरी श्रद्धा के साथ माँ की आराधना करते हैं, तो आपका जीवन सुख, समृद्धि और शांति से भर जाएगा।
जय माता दी!
