पिठौरी अमावस्या, भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है। यह विशेष रूप से माताओं द्वारा अपने बच्चों की दीर्घायु और समृद्धि के लिए की जाने वाली पूजा है। इसे एक अनोखा अमावस्या पर्व कहा जाता है क्योंकि इस दिन पिठौरियाँ (आटे की मूर्तियाँ) बनाकर उनकी पूजा की जाती है।
2025 में यह अमावस्या और भी खास है क्योंकि इसके समय राहु का गोचर महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा। राहु का संबंध मायाजाल, भ्रम और अचानक घटने वाली घटनाओं से है। ऐसे में पिठौरी अमावस्या पर की गई पूजा और व्रत का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
पिठौरी अमावस्या की पौराणिक मान्यता
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माना जाता है कि इस दिन माता पिथौरी देवी की पूजा करने से बच्चों की रक्षा होती है।
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महिलाएँ आटे की 64 पिठौरियाँ बनाकर देवी की पूजा करती हैं।
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यह व्रत परिवार में सुख, शांति और समृद्धि लाता है।
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राहु गोचर और अमावस्या का ज्योतिषीय महत्व
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राहु भ्रम और अवरोध का कारक है।
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अमावस्या पर राहु का प्रभाव व्यक्ति के मानसिक संतुलन और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
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जिनकी कुंडली में राहु–चंद्र दोष या कालसर्प दोष है, उनके लिए यह समय विशेष पूजा और मंत्रजप करने का होता है।
पिठौरी अमावस्या पर राहु शांत करने के लिए गणेश और देवी पूजन अत्यंत शुभ माना गया है।
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निष्कर्ष
Pithori Amavasya & Rahu’s Transit: A Unique New Moon Festival केवल मातृ शक्ति की पूजा का पर्व ही नहीं बल्कि ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन सही समय पर पूजा और राहु से संबंधित उपाय करने से जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं और परिवार में सुख–शांति आती है।
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